संपादकीय : लोकतंत्र का महायज्ञ

निर्वाचन आयोग की ओर से आम चुनाव की तिथियां तय कर देने के साथ ही देश लोकतंत्र का उत्सव मनाने की दिशा में बढ़ चला है। पिछले आम चुनाव में मतदान के नौ चरणों के मुकाबले इस बार सात चरण घोषित होने से यह तो स्पष्ट होता है कि निर्वाचन आयोग पहले के मुकाबले कुछ और समर्थ हुआ है, लेकिन उसकी कोशिश यही होनी चाहिए कि चुनाव की प्रक्रिया कम से कम लंबी हो। आज के इस तकनीकी युग में अपेक्षाकृत छोटी चुनाव प्रक्रिया के लक्ष्य को हासिल करना कठिन नहीं होना चाहिए। निर्वाचन प्रक्रिया न केवल यथासंभव छोटी हो, बल्कि वह राजनीतिक दलों और उनके प्रत्याशियों के छल-कपट से मुक्त भी होनी चाहिए। यह सही है कि पहले की तुलना में आज की चुनाव प्रक्रिया कहीं अधिक साफ-सुथरी और भरोसेमंद है, लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि वह बेहद खर्चीली होने के साथ ही धनबल से भी दुष्प्रभावित होने लगी है। विडंबना यह है कि चुनाव लड़ने वाले इस आशय का शपथ-पत्र देकर छुट्टी पा लेते हैं कि उन्होंने तय सीमा के अंदर ही धन खर्च किया। यह विडंबना तब है जब हर सियासी दल और खुद निर्वाचन आयोग भी इससे अवगत है कि आज चुनावों में किस तरह पानी की तरह पैसा बहाया जाता है। अब पैसे बांटकर चुनाव जीत लेने की प्रवृत्ति बढ़ती ही जा रही है। समस्या यह है कि जहां जागरूक जनता चुनावी खामियों को दूर करने की जरूरत महसूस करती है, वहीं राजनीतिक दल ऐसी किसी जरूरत पर ध्यान ही नहीं देते। यह अच्छा नहीं हुआ कि बीते पांच साल में न तो कोई ठोस राजनीतिक सुधार किया गया और न ही चुनावी सुधार।

आम चुनाव को भले ही लोकतंत्र के उत्सव की संज्ञा दी जाती हो, लेकिन सच यह है कि इस उत्सव में राजनीतिक बैर भाव अपने चरम तक पहुंचता दिखता है। कई बार परस्पर विरोधी राजनीतिक दल-एक दूसरे के प्रति शत्रुवत व्यवहार करते हैं। वे न केवल अपने राजनीतिक विरोधियों के प्रति अशालीन-अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल करते हैं, बल्कि उन्हें बदनाम करने और नीचा दिखाने के लिए झूठ, कपट का सहारा भी लेते हैं। इसका कोई औचित्य नहीं कि आम चुनाव के मौके पर राजनीतिक विमर्श रसातल में चला जाए। दुर्भाग्य से राजनीतिक दलों से यह उम्मीद कम ही है कि वे राजनीतिक शुचिता और लोकतांत्रिक मर्यादा का ध्यान रखते हुए चुनाव लड़ेंगे। ऐसे में मतदाताओं की जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वे अपने मताधिकार का इस्तेमाल सोच-समझकर करें। अपने देश में यह एक बीमारी सी है कि बाकी समय तो हम सब जातिवाद, संप्रदायवाद, क्षेत्रवाद को कोसते हैं, लेकिन वोट देते समय जाति-मजहब को ही महत्व दे देते हैं। जात-पांत के आधार पर राजनीति इसीलिए होती है, क्योंकि एक तबका इसी आधार पर वोट देता है। यह भी किसी से छिपा नहीं कि कई बार राष्ट्रहित के मसलों से अधिक महत्व संकीर्ण स्वार्थ को दे दिया जाता है। चूंकि आम चुनाव देश के भविष्य के साथ राजनीति की भी दशा-दिशा तय करते हैं इसलिए आम मतदाता का इस भाव से लैस होना जरूरी है कि वह वोट के जरिये एक महती काम करने जा रहा है।

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